उनके जन्म से पूर्व ही यह प्रगट हुआ था की माईकल युसुफ के लिए परमेश्वर का एक दर्शन है। गर्भावस्था से ही उनकी माँ का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण डॉ. ने सलाह दी थी की जन्म के समय बच्चे के जीवन को खतरा हो सकता है, इसलिए गर्भपात कराना ठीक रहेगा, उसके लिए तिथि निश्चित की गई। परन्तु परमेश्वर ने हस्तक्षेप किया और परिवार के पास्टर को उनके पास भेजा जिन्होंने उन्हें आस्वस्त किया कि यह गर्भ धारण परमेश्वर की ओर से है। उन्होंने उनको बताया की वे निर्भय रहें और यह बालक परमेश्वर की सेवा के लिए पैदा होगा। माईकल के माता पिता ने उनकी बात को परमेश्वर का सन्देश समझकर स्वीकार किया और उनकी बात मानी। उनकी माँ ने उनको जन्म दिया और सोलह साल की उम्र में जब उन्होंने प्रभु मसीह को अपना जीवन समर्पित किया तब तक वो जीवित थी। इस विश्वास के साथ कि परमेश्वर ने उन्हें मिस्र से बहार बुलाया है, माईकल ने निकास वीजा ऐसे समय में लेना चाहा जब किसी भी विधार्थी को पासपोर्ट प्राप्त करने की या देश छोड़ने की अनुमति नहीं थी। फिर से परमेश्वर ने हस्तक्षेप किया और अद्भुत रीती से उन्हें वीजा मिला। वो ऑस्ट्रेलिया में जाकर बस गए जहाँ पर उन्होंने सिडनी के “म्यूरे थियोलोजिकल कॉलेज” में पढाई की और एक दीक्षित पासबान बन गए, जहाँ एलिजाबेथ से उनकी भेंट हुई, जो बाद में उनकी पत्नी बनी।

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